

|
· प्रो. डी.वी. सिंह 1990 में संस्थान के नए निदेशक बने । · इस दशाब्दी की शुरूआत भूतल-परिवहन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कुट्टिम निष्पादन अध्ययन से हुई । कुट्टिम निष्पादन संकेतक डाटा 113 परीक्षण खण्डों से पाक्षिक आधार पर एकत्रित किया गया जिसमें राज्य तथा महामार्गो से नमूना आधार पर कुछ चुनिंदा नए तथा पुराने दोनों खण्ड सम्मिलित किए गए । बाद में अनुकूलतम रखरखाव तथा पुनर्वास रणनीति निर्धारित करने के उददेश्य से विभिन्न प्रकार के निघर्षण स्तर के लिए अलग-अलग माडल विकसित किए गए । · संस्थान ने पालिमर संशोधित डामर (पीएमबी) संघटन विकसित कर इनका पेटेंट करवाया । देश में कुछेक उत्पादकों को उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी हस्तान्तरित की गई · बैंकलमैन बीम का प्रयोग करते हुए विक्षेप ट्रांसडयूसर यंत्र के प्रयोग द्वारा विक्षेप डाटा संग्रह संचालित किया गया जिसके संकेत तत्काल परीक्षण के पश्चात् संसाधित सूचना तैयार करने के लिए माइक्रोप्रोसैसर आधारित प्रणाली में डाले गए । · कार्य स्थल सी बी आर मापने तथा अंकीय मान प्रदर्शित करने के लिए संस्थान में एक सुवाह्य यंत्र (पोर्टेबल डिवाइस) विकसित किया गया जो कि इम्पैक्ट टैस्टर के नाम से जाना जाता है । · कुटिटम स्थिति आंकड़ा संग्रह व्हीकल माउंटिड हाई रेजोल्यूशन कैमरा का प्रयोग करते हुए बनाया गया । प्रतिबिम्ब (इमेज) विश्लेषण साफ्टवेयर का प्रयोग करते हुए प्रणाली से कुटिटम की (दरार, उधेइन, गढढे) संकट पूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई । · संस्थान के विशेषज्ञ (एक्सपर्ट) पर्यवेक्षण के अन्तर्गत अधिकतर पहाड़ी क्षेत्रों में अन्त:पाशन कंक्रीट खण्ड कुटिटम निर्मित की गई । इस प्रकार की कुट्टिम के लिए नीचे उचित नींव तथा किनारों से परिरोध सहारे की आवश्कता होती है । · प्रो. ए के गुप्ता ने 1996 में संस्थान के नए निदेशक का पदभार सम्भाला । · विभिन्न शहरों में पुरानी सुनम्य कुट्टिम का स्थान कंक्रीट कुट्टिम ले रही है क्योंकि आजकल देश में निर्माण के लिए कच्चा माल तथा प्रौद्योगिकी दोनों उपलब्ध हैं । संस्थान कंक्रीट सड़क निर्माण में बड़े पैमाने पर अभिकल्प प्रदाता, गुणवता नियंत्रक तथा पर्यवेक्षक के रूप में जुड़ा हुआ है । · इस दशक में संस्थान का रूचिपूर्ण अनुसंधान क्षेत्र का विषय रहा कि किस प्रकार अपशिष्ट सामग्री का निर्माण में प्रयोग किया जाए । संस्थान का प्रयास तटबंध निर्माण में उड़नराख, तल राख के प्रयोग को लोकप्रिय बनाना है । यह सार्वजनिक निर्माण विभाग में अच्छी तरह से स्वीकृत है तथा कुछेक महत्वपूर्ण कार्य हैं जैसे दूसरे निजामुददीन सेतु के लिए उड़न राख का तटबंध में प्रयोग, ओखला फलाई ओवर, कर्नाटक में रायचूर सड़क का कुछ खण्ड । · सेतु अभियांत्रिकी में आर सी सी संरचना में संक्षारण को न्यूनतम करने के लिए सुधरे हुए परत लेप (कोटिंग) पर खोज, टी-आधार आर सी सी संरचना के आचरण पर अध्ययन तथा सेतुओं के निष्पादन मानिटरिंग के लिए, नई तकनीकों का विकास करने के लिए निजी क्षेत्रों में दिशा निर्देश तथा अभिकल्प मैनुअल तैयार किए गए । · प्रो. पी के सिकदर ने संस्थान के आगामी निदेशक का पदभार 23 अक्टूबर 1998 में सम्भाला ।
|
|
तालाब राख का संहनन |
|
1990-1999 के दौरान की प्रमुख घटनाएं :- |

|
नए कुट्टिम खण्ड पर कुट्टिम निष्पादन अध्ययन के लिए परीक्षण खण्ड का निर्माण |

|
वै.औ.अ.प. के स्थापना दिवस अवसर पर पुरस्कार विजेता बच्चों तथा संस्थान के स्टाफ के साथ डा. डब्लू.डी.ओ. पैटरसन, वरिष्ठ महामार्ग अभियन्ता, विश्व बैक |